Dreams

Tuesday, April 26, 2016

दिल से ही जीता जाता हर स्वयंवर (c) Copyright

 
 
 
दिमाग़ को चुनाव की अनुमति दी
दिल ने क्या बिगाड़ा ईश्वर
चुनौती का चयन करने वालों ने भी
दिल से ही जीता हर स्वयंवर

दिमाग़ को चुनने का ग़ुरूर है
दिल को बस बह जाने का फ़ितूर 
मय बनाने वाले ये नहीं समझे मगर
नशे के लिए तो दिल ही है मशहूर

ज़हन से मंज़िल बनती है
पर हौसले दिल दिया करते हैं
इश्क़ में दिमाग़ की नहीं चलती
वहाँ फ़ैसले दिल किया करते हैं

रणनीति सेनापति बनाते भले हैं
पर चुनौती शूरवीर दिया करते हैं
भूगोल राजा के हाथ लग जाते हैं
इतिहास स्वर्ण अक्षरों से अंकित, सेनानी किया करते हैं

समारोह बुद्धिजीवियों का माना लो अभी
सदियों तक तो मोहब्बतें हर याद रहेंगी
समाधियों के फूल मुरझा जाएँगे
मज़ारों की अगरबत्तियाँ ही याद रहेंगी

चुनाव, संदेह को जन्म देता 
दिल बहे है एक डगर
दिमाग़ बाँध बनाता नदी पर
दिल की धारा चट्टानें चीरे है मगर

दिमाग़ को चुनाव की अनुमति दी
दिल ने क्या बिगाड़ा ईश्वर
चुनौती का चयन करने वालों ने भी
दिल से ही जीता हर स्वयंवर

 
~©  अनुपम ध्यानी 

1 comment:

संजय भास्‍कर said...

अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग पर आकर....आपकी रचनाएं पढकर और आपकी भवनाओं से जुडकर....

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
संजय भास्‍कर
शब्दों की मुस्कुराहट
http://sanjaybhaskar.blogspot.in