Dreams

Sunday, April 4, 2010

मैं कौन ? Copyright ©.


क्या मैं स्मारक हूँ

जो चौराहे पे पीतल

से पुता है

और इतिहास के भूले बिसरे

पन्नो से निकल के

आज कुछ कहने के प्रयास

में जुटा है?

जो है पुरानी जीत का स्तम्भ

या फिर आने वाली विजय का

प्रारंभ ?

युग पुरुष या फिर

प्राचीन सभ्यता

का चिन्ह?


मैं यह सब नहीं

मैं निरंतर बदलता वोह

गतिमय प्रतिबिम्ब हूँ

जो हर समय चक्र के

अंत में दिखता है

बुराई का बदसूरत चेहरा

और अच्छाई की सुन्दर मूरत

का भव्य मिश्रण

जो भाग्य और समय के

तराजू में तुलता है.

जो पथभ्रष्ट हो गए समाज

की मशाल है

और मानव की निरंतर

उन्नती की मिसाल है

जो रचना भी है और रचैता भी

अभिनय भी और अभिनेता भी

शिल्पी और मूरत भी

तिरिस्कृत भी है और ज़रूरत भी

पेड़ भी है और छाया भी

स्रोत भी है और काया भी

मैं इतिहास का व्हो स्वर्ण पन्ना हूँ

जो वर्त्तमान में लिखा जा रहा है

और भविष्य की ओर बाँहें फैला रहा है।


यह चिंतन इसलिए क्युंकि

प्रतिपल मैं यह भांप रहा हूँ

कि मैं अब सोया नहीं , जाग रहा हूँ

मेरे जागने से यह जग जागेगा

मेरे तेज से अँधेरा दूर भागेगा

मूक आत्माएं बोल उठेंगी

उम्मीद का चेहरा खिल उठेगा

हर ओर मेरे आवेग से

कुछ कर गुजरने का तूफ़ान उठेगा

और यह कहेगा

वो था, वोह है और रहेगा

तुम भी देखो, तुम भी जागो

वो जागा था, फिर भागा था

तुम भी जागो और उसी गति से

भागो

और दूर क्षितिज पे अपने

विश्वास का परचम बांधो

विजय का परचम बांधो

उठान का परचम बांधो!

Thursday, April 1, 2010

आधा सच या पूरा झूठ Copyright ©.


मिथ्या, भ्रम या अन्धकार

जीवन मृत्यु

स्वीकृति या तिरस्कार

भौतिक भक्ति या विचार

यह क्या हैं

आधा सच या पूरा झूठ ?

यह प्रश्न इसलिए क्यूंकि

सब धुंधला सा दिखता है

या तो उजाला कम है

या अन्धकार है और आँखें बंद है.

क्यूंकि जो दिखता है

मैं जानता हूँ कि वो पूरा सच नहीं

रेगिस्तान में मृगत्रिष्णा की भाँती

अथाह फैला हुआ एक झूठा प्रतिबिम्ब

या कपूर की भाँती

उदात्त होती एक सचाई ।


जहाँ तक मेरा दृष्टि

देख सकती है

और जहा तक भी मेरे विश्वास

की श्रद्धा और भक्ती है

बस धुन्धलापन नज़र आता है

निष्कलंक इस छवि

में एक उन्देखा दाग नज़र आता है।

या तो मेरी कल्पना प्रोढ़ हो चली है

या फिर इस चक्रवूह के पार उड़ पड़ी है.

या मैं मादक हूँ इतना कि मेरे

संतुलन का बाँध ढहे जाने की घडी है।

जो भी है

कुछ तो है जो मैं भांप सकता हूँ

पर नाप नहीं सकता

जिसकी प्रतिपल अनुभूति होती है

पर मैं थाम नहीं सकता।


इस धुंधलेपन को मैं अभी

स्पस्ट बता नहीं सकता

इस रहस्य को मैं

अभी सुलझा नहीं सकता

परन्तु इस सत्य और मिथ्या

के बीच की बारीक रेखा पे बैठके

भौतिक और दैविक दोनों

कुछ कुछ साफ़ दिखता है

और इस ज्ञान से, भीतर

एक अद्भुत लौ जलती है

एक ऊर्जा,

एक शक्ति

ज्वालामुझी

विद्युत

कि मैं जानता हूँ

सब है या तो आधा सच या पूरा झूठ

आधा सच या पूरा झूठ

आधा सच या पूरा झूठ!

कायरता या बुद्ध Copyright ©.


ज्ञात हैं हमें कि हर भाव
इतना शक्तिशाली होता है
कि वो आपका जीवन
बदल दे
असीम शक्ति का
प्रमाण है भाव
व्यक्त न भी हो सके तो
क्या
है वो ही प्रणाम
जो पशुओं और मनुष्य में
करता है चुनाव
एक ऐसा ही भाव है
कायरता।

कायरता, बुजदिली
या जो भी कह लो
अद्भुत शक्ति है इसमें
जो काया पलट दे
और साधारण से
असाधारण , अनुपम में बदल दे
भय हो जब हार का
कुछ करने की न जब शक्ति हो
न हो इश्वर पे विश्वास
करने की क्षमता
न कर्म की भक्ति हो
हाथो से रेत के प्रकार
निकलते जीवन
को थाम लेने का न हो जब शौर्य
और न ही
तूफ़ान के थम जाने की प्रतीक्षा का धैर्य
अपनी क्षमता पे जब न हो विश्वास
और जब हार के डर से थम जाये प्रयास
न हो जब वास्तविकता के थप्पड़
का सामना करने की हिम्मत
और बिखरती ज़िन्दगी को समेटने की शिद्दत
जब ह्रदय में हो घबराहट का भूकंप
तब जागती है एक ऊर्जा
क्रोध और कुंठा से लिपटी ज्वाला
स्वयं से दृष्टि न मिलने से
जब मन हो दुखी
तब खिलता है कुछ कर गुजरने का
ज्वालामुखी

महापुरुषों का जीवन देखो
सब कायर थे
अपनी कायरता की अनुभूति हुई
फिर उसपे विजय पायी
और इस जीत की शक्ति से उन्होंने
इस विश्व में एक अद्वितीय
बिजली दौडाई
दिव्य ज्ञान की ज्योत जलाई
और उसी मशाल से
सारी दुनिया चमकाई
अपनी व्यग्तिगत कायरता के दम पे
देखो कैसे
स्वर्ण अक्षरों से
इतिहास में अपनी जगह बनायी

यदि तू कायर है
और तू यह जानता है
तो भय न कर इस बात का
विजय समारोह मनायेगा
समय कटे जब इस रात का
ग्लानी न हो कभी तुझे
कि तू कायर है
और ना ही लज्जा हो इस बात की
कि तुझे यह एहसास है
कि तू कायर है
बस हिम्मत कर ले एक दिन
विजय पाले उस कायरता पे
फिर देख यह भाव तुझे
कहाँ से कहाँ लेके जाता है
और कैसे तेरा विजय बिगुल बजाता है
भाग्य कैसे चमकाता है
और कैसे तुझे इतिहास
कायर नहीं
बुद्ध बुलाता है
बुद्ध बुलाता है
बुद्ध बुलाता है!