Dreams

Friday, June 4, 2010

प्रशांत ! Copyright ©


कैसे विनम्र सा बैठा

अथाह सागर फैला हुआ

मौत सा सन्नाटा सुनाई देता

इसके अन्दर सिमटा हुआ

बंद करके आँखें मैं

लेट गया सफ़ेद रेत पे

सुनने को आतुर था मन

सुर जो बनता

लहरों के साहिल पे टकराने से

जब पूरा ध्यान उन लहरों पर था

और मन के सारे द्वार मैंने खोल दिए

पहचानने को वो शक्ति मैं था बैठा

ऐसा लगता मानो कह रहा सागर

धैर्य हूँ मैं

शंकर हूँ और शक्ति हूँ मैं

आदि और अंत हूँ मैं

तेरे अन्दर छुपा बैठ

संत हूँ मैं

बाहर हलकी हलकी चंचलता

पर भीतर प्रशांत हूँ मैं!


उसके स्वर को सुनके मैंने

चक्षु खोल दिए

और देखा कि कितना नीला

रंग था उसका

जैसे हो शंकर का कंठ

जिसने विष जग के सारे धारण किये

आकाश को चुनौती देता यह नीला सागर

उगते, ढलते सूरज को सलामी देता नीला सागर

अपनी गहराई में न जाने कितने

मोती हुए छुपाये

एक कुँवारी अद्भुत दुनिया बसाए

और एक दैविक शक्ति का भण्डार

ऐसे कि क्रोधित हो जाए तो

नष्ट कर दे पूरा संसार

पर फिर भी कितना शांत

कहता “ अपने आप में “

ब्रह्मा और ब्रह्माण्ड हूँ मैं

प्रशांत हूँ मैं!


मन किया यही इसको देखता रहूँ

आलिंगन करलूं और समां जाऊं इसकी गहराई में

इसकी शीतल लहरों में गोते खाऊं

और इस जैसा स्वतंत्र हो जाऊं

जिसे किसी भी बात का न भय हो

न कोई संकोच

बस एक तथ्य , बस एक सोच

अकस्मात् ही लहरें बोली

यदि चाहिए मुझ जैसा

व्यक्तित्व, मेरी जैसी काया

जिसमे पूरा जीवन है समाया

तो पहले अनेक नदियों को

स्वीकार करना सीख

भंवर को समां के

तूफ़ान को झेलना सीख

रात्रि में ज्वार भाटा को सह

और सवेरे मुस्कुराना सीख

दे सूरज को सलामी

चन्द्र को कर नमस्कार

जो कोई तेरी ओर आये

न कर उसका तिरस्कार

क्रोध को डाल लगाम

उसपे कर नियंत्रण

ऐसा कि सब जाने छुपी शक्ति तेरी

और कर दें आत्मा समर्पण

जब यह सब में होगा निपुण

और अपना लेगा यह सारे गुण

तब तेरी भी होगी पूजा

कहलाएगा तू संत

अपार शक्ति को दिल में समां के

हो जायेगा तू प्रशांत

हो जायेगा तू प्रशांत

हो जायेगा तू प्रशांत !

Thursday, June 3, 2010

जन्मदिन मुबारक ! Copyright ©

रक्षाबंधन और जन्मदिनो से

कहीं ऊंची है यह अनुभूति

अद्वितीय, अद्भुत और अपूर्व

है उसकी गरिमा

सिर्फ एक युग में एक बार ही

प्रकट है होती

पार्वती सी पवित्रता

और दुर्गा का तेज लिए

सरस्वती की चमक माथे चढ़ाये

और लक्ष्मी का तिलक लिए

लिया जन्म उसने मेरे घर में

किलकारियों से झोली भरदी

उल्लास से सारे कोने भर दिए

आज उसी अद्भुत अनुभव को मैं दोहराता हूँ

इक्कीसवीं इस वर्षगाँठ पे

आज तेरे ही गुण गाता हूँ

प्यारी बहना ऐसे मुस्कुराते

तू सौ साल जिए

जैसे मेरी झोली भर दी तूने

हर ओर ऐसी खुशियाँ फैलाते जा तू

जैसे देवी ने प्रसाद दिए!


बचपन के वो दिन आज तुझे

स्मरण कराना चाहता हूँ

जब मेलों मील भागा था मैं

तेरी पहली मुस्कान को देखने के लिए

और कैसे हस के तूने गले लगाया मुझको

मेरा मन जैसे अमृत पिए.

फिर छुटपन के वो सारे झगडे

और वो सारी डांट और मेरा गुस्सा

जो तूने चुप चाप सहे

जैसे सारी त्रुटियाँ पीकर भी

गंगा कल कल, चुपचाप बहे

कैसे मेरी हर गलती पे भी मुझे

आराध्य का सा स्थान दिया

आज तुझे मैं बतलाता हूँ

हमारे इस बंधन में

तू है चमकती बाती और तुझे थामे

मैं तेरा दिया

आज समय है बतलाने का

क्यूँ तुझे अपूर्व जग कहे

“जया” से तुलना क्यूँ हो तेरी

और क्यूँ तेरी गरिमा की चादर

की गर्मी के अन्दर हम सब रहे


ह्रदय मेरा विधाता से

तेरे लिए प्रार्थना कर रहा

इस प्रतिमा की मुस्कान हमेशा

हरदम बरकरार रहे

तेज फैलाते रहे यह जग पे

हर रंग , वैभव और ढेरों खुशियाँ

हरदम इसकी झोली में रहे.

यह मैं जानू

हरदम, प्रतिपल

कोई नहीं ऐसा दूसरा

इश्वर नहीं बनाता हर किसी को

अपूर्वा

अपूर्वा

अपूर्वा !

Wednesday, June 2, 2010

अभय ! Copyright ©


बस एक बात है आजकल

मानुष बहुत डरता है

अपने उत्तर्दाइत्व को

दूसरों के सर रख के

आगे बढ़ता है

खड़े कर लेता हाथ अपने

क्यूँकी आलोचना से डरता है

और भयभीत चाल से आगे बढ़ता

फिर भी खोखली जीत का दम भरता है

इस खोखली जीत का सेहरा पहना है

सिर्फ वो जानते हैं

अनदेखा कर के इस सत्य को

जीवन को किस्मत की रेखा मानते हैं

लेकिन सब हैं भयभीत

सहमे, डरे रहना हो गयी

है इस जग की रीत

कब आएगा वो दिन

जब सारे मृदंग बाजें

धुन में और हो निर्भयता की लय

कब होगा मानव डर से अजय

और कब बनेगा

अभय?


हार का डर

नपुंसकता का भय

प्रसिद्धि न मिलने

और किस्मत से शह

खोखली इज्ज़त खोने का डर

परीक्षा से डर

उसके परिणाम से उससे भी ज्यादा भय

अपने आपको सिद्ध करने का डर

गरीबी का भय

कोई कहता तू न होगा अमर

कोई कहता भगवान् से तो डर

डर डर के जी रहे सब

बिना वजह रहे परिस्थितियों से दब

कैसे चलेगा जब साँसे भयबीत हों

होंट कंपकपा रहे और हौसले

सीमित हो

कैसे कदम बढ़ेंगे जब

बंधे हो पाँव इस डर की बेड़ियों से

कैसे विकास का परचम लहराए

जब जी रहे हों हम कैदियों से

तोड़ यह सब, छोड़ यह सब

पा ले इस पे विजय

सर ऊंचा कर, छाती चौड़ी

हो जा अभय!


ऐसे न डर कि जीना दूभर हो जाए

ऐसे हो जा कि डर भी तुझसे डर थर थर कम्प्कपाये

इस डर को जितना दूध पिलाओगे

उतना ही सर्प सा यह फन्फनायेगा

बने बनाये काम को

पल में बहा ले जाएगा

इस समस्या का सिर्फ एक निवारण

मन पक्का कर

निर्भीकता का दें उदाहरण

कुछ करना जीवन में है

कुछ पाने की यदि चाह हो

तो निकाल फेंको इस डर को

और करलो आँखे बंद और कहदो

मैं निडर हूँ

खड़ा इधर हूँ

कर लो जो करना है

कुछ भी हो जाए यदि

अब मुझे नहीं डरना है”

आगे बढ़ने का है अभी समय

मैं हूँ निडर, मैं हूँ निर्भीक

मैं हूँ अभय

मैं हूँ अभय

मैं हूँ अभय!