Dreams

Wednesday, May 18, 2011

गिद्ध !Copyright ©


गिद्ध खड़े हैं परनालों पे
और घनघोर घटाएं फैलीं हैं
रक्त बह रहा नालों में और
स्वछता ही मैली है
खूब बही जो सर सर हवाएं
वोह आज बस ज़हरीली हैं
गिद्धों ने तो सर ऊंचा कर
रक्त से होली खेली है



आज कटे हैं सर राजकुमारों के भी
सुबह से बस मौत ही माओं ने झेली है
दोपहर होते ही चिताएं जल उठी
केवल लहुलुहान हथेली है
गिद्ध आये थे सुबह सुबह और
कर गए ऐसा प्रहार
अपनी चोंचो और नाखूनों से
कर गए नरसंघार
अब शाम हो चली और जीते गिद्ध बैठे
देख रहे हैं सबकी हार
ऐसे मंज़र में एक आँख खुल उठती है
नज़र मिला के गिद्धों से वो काया
खौल उठती है



उन आँखों ने यह भयावह होली
पूरे दिन आज देखी है
लड़ते लड़ते घायल हो चली वो आँखें
और चिताओं की गर्मी सकी है
उठ खड़े हो और देख क्या मजमा
गिद्धों ने फैलाया है
कैसे अपने नाखूनों से तेरी धरती को
लाल बनाया है



डरते डरते उस काया ने शक्ति अपनी बटोरी है
एक हाथ में खड्ग और एक में रक्त भरी कटोरी है
क्रोध से उद्गम एक बिजली अब उसकी नसों में जो दौड़ी है
कातिल गिद्धों के सामने अब उसकी छाती चौड़ी है
हर दिशा से गिद्धों ने किया प्रहार
कोई टूटा टांगो पे तो किसे ने किया दिल पे वार
उस काया ने खड्ग को अपनी, कुछ ऐसे लहरा दिया
गिद्धों के कलमे सरों से उसने बनाया अपना हार
अब रात हो चली, गिद्ध मर चलो और थक गयी वो काया है
पर कल और आयेंगे , और मरेंगे और बनेंगे हार




यह गिद्ध निरंतर आते रहते
रक्तपात फैलाते रहते
बिना भय और कोमलता के
मानव लहू बहाते रहते
उठ खड़े हो , इन गिद्धों से न मानो हार
अपनी शक्ति को पहचानो , निकले ज्वाला बारम बार
अपनी तलवार फैलाओ ऐसे कि
एक बार में करदो इनको चित्त
इनकी उड़ान को सीमित करके
करदो इनको शुद्ध
नहीं तो यह फिर आयेंगे
फिर से जीवन बिखरा जायेंगे
यह निर्दयी गिद्ध
यह निर्दयी गिद्ध
यह निर्दयी गिद्ध

Tuesday, May 17, 2011

समभोग ! Copyright ©


हाड मॉस के पुतले हम और
हाड मॉस का अपना धंधा
देह धर्म और ईमान की बोली
काला , कुटिल और गन्दा
समभोग को करके व्यक्त परदे पर
उसके तात्पर्य को भूल गए
अधनंगे शरीरों पे लार टपका के
काम , क्रोध में झूल गए
कामसूत्र के मूल मंत्र को हमने
यूँ ही भुला दिया
नग्न नर-नारी को बस एक शय्या में
सुला दिया



समभोग है जुड़ना आत्मा का परमात्मा से
शिव-शक्ति के मिलन से प्रकट होती उस आत्मा से
जब टकराए एक निरंतर गतिमय शक्ति
एक निरंतर स्थिर काया से
ले जो ऊर्जा जन्म इन से, दूर हो जो इस माया से
देह मिले या मिले मन
न मिलें आत्मा तो यह माया है अधूरी
जब समां जाओ तुम मुझमें और मैं तुझमे
तब होती यह यात्रा पूरी
जैसे गंगा- जमुना मटमैली सी जुड़ जाएँ
संगम करते उठ जाएँ
वैसे समभोग की हो कामना
हो तब तक परमात्मा से अपनी दूरी



मंथन करके अमृत निकले
निकले गीता सार
इस मिलन से त्रिदेव प्रकट हों
जन्म ले शक्ति अपार
मूलाधार चमके स्वयं का
उत्तेजित हो मन इतना
शिव की भाँती जटाओं से निकले गंगा की धार
समभोग में मोक्ष की शक्ति
मोक्ष परमात्मा से परिचय
परिचय स्वयं का देवों से और
स्वयं पे स्वयं की विजय



समभोग मात्र से , समय को जकड़ा
अपने अन्दर ब्रह्माण्ड को पकड़ा
उक शक्ति से रचे वेद और रची गयी
यह सभ्यता
उससे उत्पन्न भ्रूण हुआ जो
इतिहास अपना गया रचा
इस मिलन से भूगोल बदल आये
कई सम्राट
स्वयं का स्वयं से समभोग हुआ तो
निकली शक्ति विराट



स्वयं से स्वयं का समभोग
रोक नहीं पाओगे
उस शक्ति को केंद्र बना के
बुद्ध हो जाओगे
यह शक्ति पहचानो तो
भूलोगे विलास , मोह, माया ओर भोग
बस अपना लोगे इस मार्ग को
करोगे जब स्वयं का स्वयं से समभोग
फिर स्वयं का आत्मा से समभोग
फिर आत्मा का परमात्मा से समभोग!

Friday, May 13, 2011

सोच ! Copyright ©


मैं अपने सपनो का प्रतिबिंब हूँ

मैं अपनी इक्च्छाओं की तस्वीर

कभी गगन में उड़ता पंछी

कभी चिंतक गभीर

मैं अपनी सोच का जीता पुतला

मैं अपने मंसूबों की जागीर

जब चाहूं राजा हो जाउन

जब चाहे फकीर

मैं लंबी दौड़ का घोड़ा

मैं लौ का पतंगा

मैं इंद्रधनुष सा रंगीन

मैं काले मेघों सा संगीन

कभी दानव रूप करूँ धारण

कभी बन जाउन पियर

कभी पथिक हूँ, कभी राह भी

कभी किनारा , कभी बहता नीर

कभी कड़वाहट का काला घूँट

कभी हूँ मीठी खीर

मैं अपने सपनो का प्रतिबिंब हूँ

मैं अपनी इक्च्छाओं की तस्वीर

कभी जग को रौशन करता सूरज

कभी मैं टिमटिमाता तारा

कभी पूरा जग लुटा दूं

कभी मुट्ठी में मेरे जग सारा

कभी हूँ मैं अमृत धारा

कभी हूँ सागर सा खारा

मैं अपनी सोच का चित्रफलक

कभी हूँ चित्रकार

कभी हूँ भ्राह्मकमल मैं

कभी हूँ गीता सार

मैं हूँ कमान की प्रत्यंचा

कभी हूँ स्वयं तीर

मैं अपने सपनो का प्रतिबिंब हूँ

मैं अपनी इक्च्छाओं की तस्वीर

सोच मात्र में ब्रह्म की शक्ति

सोच से शिव होता शंकर

सोच से ही कल कल बहता पानी

और सोच से ही रह जाता कंकर

फैलाने ने अपनी कल्पनाओं को पंख

उड़ने दे गगन में अपने गीत

बहने दे अपनी इच्छाओं को

तोड़ दे सारी रीत

सोच बनाती तुझको मुझको

सोच बनाये कायर या वीर

बन जा अपने सपनो का प्रतिबिंब तू

बन जा अपनी इच्छाओं की तस्वीर

इच्छाओं की तस्वीर

इच्छाओं की तस्वीर.

Wednesday, May 11, 2011

ताजपोशी ! Copyright ©


उन दिक्कतों को न भूलना
उन कड़वाहटों को न भूलना
उस कायरता को न भूलना
उस हार को न भूलना
उस कोमल खाल को न भूलना
तो तुझसे थी खरोंची
यह सारी बातें न भूलना
जब होगी तुम्हारी ताजपोशी



उन घावों को न भरने देना
उन गालियों को न ग़ुम होने देना
न भूलना अकेलापन, न दुश्मनी सेना
न तलवारें , न कटारें
न अपनी " बचा लो" की पुकारें
न भूलना जंगें
न रिश्तों की दरारें
न भूलना गिरते महल
न भूलना घायल घोड़े पे सवारी
जब ताजपोशी होगी तुम्हारी



जब मखमली चादर पे बैठोगे
जब जाम-इ-ज़िन्दगी चखोगे
जब गूँज उठेगा दरबार तुम्हारे आने पे
जब सुनहरी थाल सजेंगी
जब कायनात मुस्कुराएगी तुम्हारे गाने पे
जब हुक्म मानेंगे , पुराने हुक्मरान
जब जग देगा तुम्हारे ख्वाब को अंजाम
जब तख़्त पिघलेंगे, जहाँ से तुम गुजरोगे
न भूलना उन लाशों का मंज़र
न भूलना खून से धरती बंज़र
न भूलना कांटे, न दुश्मन, न प्रहारी
जब ताजपोशी होगी तुम्हारी



धर्माशोक तब बन पाया था
जब चंडअशोक मर पाया था
चंडअशोक तब बन पाया था
जब अशोक कंपकपाया था
जब ऐसे बादशाह शह से न घबराए थे
जब गिरते घुड़सवार , फिर से चल पाए थे
जब तुम गिर गिर के उठ खड़े होगे
जब अनगिनत हारों के बाद तुम विजयी होगे
तब न भूलना हर गिरते लम्हे को
तब मत भूलना रेत के हर एक कतरे को
मत भूलना कितना वह पल था भारी
जब ताजपोशी होगी तुम्हारी
जब ताजपोशी होगी तुम्हारी
जब ताजपोशी होगी तुम्हारी

Tuesday, May 3, 2011

क्या हुआ था उस अन्धकार में !!! Copyright ©


और उस दिन मैं डूब गया
काले अन्ध्रेरे में
और उस दिन मैं सूख गया
नीरसता की चादर में
मुझे था गर्व कि मैं
स्तम्भ था बहुतों का
लाठी था और दीपक भी
परन्तु उस दिन सूरज बुझ गया


सब ओर सन्नाटे का शोर था
मृत आत्माएं चीख रहीं थी
हारे हुए लोगों की टोली
आंसुओं में भीग रही थी
और इस सब में मैं भी आ पहुंचा था
झुक चुका था सर जो कभी ऊंचा था
नज़र नहीं मिली किसी से
न ह्रदय धड़का
चहुँ ओर था कालापन डर का
क्या होगा इस अँधेरे में
मैं चिल्ला उठा, तिलमिला उठा
सोचा सब सुन लेंगे
मुझे पकड़ लेंगे
समझ लेंगे
मगर मानो सब मेरी काया को
भांप न सकते थे
मेरे कम्पन को नाप न सकते थे
और मैं सुन्न था


इस काले अँधेरे में फिर
कहीं से एक बूँद टपकी
प्यासे मन को तर कर गयी
जैसे मृगत्रिष्णा की तलाश में
जल मिल जाए
भक्त को आराध्य मिल जाए
इन्द्रधनुष का छोर मिल जाए
बरसात से पहले नाचता मोर मिल जाए
क्या थी यह बूँद
यह थी अनुभूति
आत्मा के परमात्मा से मिलने की
जो कहते हैं केवल मृत्यु पर है होती
पर मैं जीवित था
स्व की शक्ती से असीमित था
तो फिर क्या थी यह बूँद


यह थी पुकार परमात्मा की
मेरी स्वयं की आत्मा की
कि तू कस्तूरी लिए घूमता है
और न जाने कहाँ कहाँ ढूंढता है
मैं तो तेरे अन्दर हूँ समाया
तूने झाँका और पाया
और तू इस अँधेरे में क्यूँ आया
यह पूछ रहा होगा
तो कहीं न कहीं यह उत्तर बूझ रहा होगा
तो सुन , तेरे अन्दर जो भण्डार है
जो मैंने तेरे अंकुर में फूँका था
वोह प्रचूर्ण मात्रा में है
जितनी कठिन राहें हैं इस जीवन में
उतनी ही मखमली चादर हैं वहाँ
जितने काँटे हैं उस से कहीं अधिक
फूल हैं वहाँ
बस तू भूल जाता है
और यह शूल हो जाता है
और मैं जानता हूँ तू फिर भटकेगा
फिर अटकेगा
पर मैं हूँ
बस झाँक अन्दर और मैं हूँ


बस फिर क्या था
उस काले अन्धकार में भी
मैं चमक उठा
उस आधी नींद से भी मैं
गूँज उठा
मैं चमकूँगा ईश की रौशनी से
तो जग चमकेगा
और फिर एक बार यह अन्धकार आ धमकेगा
पर क्या हुआ यदि वह आये
यह उजाला उस तम को दूर भगाए
जो रात बीती है
कोई बात नहीं कि वह फिर आये
पर
वह पुनः यह ऊर्जा लाये
वह पुनः यह ऊर्जा लाये
वह पुनः यह ऊर्जा लाये!