Dreams

Thursday, November 18, 2010

कि तुम तो.....Copyright ©


कि तुम हो तृष्णा

कि तुम हो आस्था

कि तुम हो डोर जीवन की

कि तुम हो लक्ष्य

कि तुम हो मार्ग

कि तुम हो डगर मेरे मन की



कि तुम हो पहचान मेरी

कि तुम हो दृष्टिकोण भी

कि तुम हो श्वेत विश्वास

कि तुम हो उम्मीद का स्रोत भी

मिलोगी या नहीं, पता नहीं

पर इस मृगत्रिष्णा, इस प्रतिबिम्ब

से हूँ मैं ओतः प्रोत भी

कि तुम हो गंगा, तुम हो गौमुख

कि तुम हो साक्षात संगम भी



कि तुम ही हो चेतना

कि तुम ही हो मेरा दुस्साहस

कि तुम हो स्पंदन मेरे भीतर का

कि तुम हो चिंगारी

धधकती लौ भी

कि तुम हो ज्वालामुखी का मूह भी



कि तुम हो उत्तर

तुम हो प्रश्न भी

और ग्रन्थ ज्ञान का स्वाद भी

कि तुम स्तम्भ हो

कि तुम नीव हो

हो मेरी काया भी



कि तुम आस हो

कि तुम प्यास हो

और हो अमृतधारा भी

कि तुम धरती हो

अथाह आकाश हो

और हो संसार सारा भी



तुम तो हो जो हो

पर मैं क्या हूँ

अनंत में एक

बिंदु

जो अपने अस्तित्व को

तुम्हारी भक्ति में डुबोता है

या फिर अश्क जो

दूर क्षितिज पे टिकी निगाहों से

तुम्हारी राह तकते तकते

बहता है।



मैं जो भी हूँ

पर तुम…तो..

कि तुम तो..

कि तुम तो..!


Tuesday, November 16, 2010

वर्चस्व Copyright ©


न मिल सके

न पा सके

बस छीन सके जिसको

और हो मुट्ठी में तेरे विश्व

ऐसी कर तू अपनी मुट्ठी

हो बस तेरा ही वर्चस्व




केवल एक खड़ा हो

सिंह की भाँती

दहाड़ रहा हो विजय का डंका

ऐसे कि उसके वर्चस्व की गाथा का

न हो किसी के मन में शंका

हो ऐसी रश्मि आँखों में

कि मौन कर दे उनका प्रयास

दंडवत करे यह जग सारा

और हो ऐसा तेरा आत्मविश्वास

कि नत्मस्ता हो सर्वस्व

तेरे जैसा कोई नहीं हो

ऐसा तेरा हो वर्चस्व



वर्चस्व मिलता नहीं विरासत में

न ही बिकता हाट में

ना ही होता मोल भाव इसका

न होता बात से

युद्ध करके ही प्राप्त होता

वर्चस्व मिलता आघात से

बंधन की बेड़ी तोड़ने की

हिम्मत होनी अनिवार्य है

और शक्ती का संतुलन

बनाये रखना भी

एक महत्वपूर्ण कार्य है

वर्चस्व की लड़ाई में

बहता लहू है अपनों का भी

पर उसे संभाले रखना

भी एक कला है जिसमे

पारंगत होना भी ज़रूरी है

वर्चस्व स्थायी न हुआ तो

उसके लिए लडाई अधूरी है



यदि परम शक्ति की करनी है

अनुभूति

जिसे काम क्रोध मोह लोभ की

बेड़ी नहीं छूती

तो तान सीन , उठा नज़र

बढा कदम और परिणाम से

मत घबरा

वर्चस्व तेरा होगा

यदि उसके लिए त्याग का

भाव तेरे मन में है

भ्रिकुटी तेरी तनी है और

निगाह लक्ष्य पे है



वर्चस्व चाहिए तो

सशक्त बना तू स्वयं को

'स्व' को पहले मित्र बना

और ललकार दिखा विश्व को

बंधा रहा तू बेड़ियों में

तो दबा देगा यह विश्व

न रहेगा तेरा अस्तित्व

न होगा तेरा वर्चस्व

न होगा तेरा वर्चस्व


Wednesday, November 10, 2010

सलामी Copyright ©

सलामी दी उगते सूरज को

सलामी दी विजयता को

ऐसों को जो इस काबिल न थे

दी सलामी जो जीत में

शामिल भी न थे

सलामी देना व्यवहार बन गया

स्वयं की काबिलियत

पे सवाल बन गया

जो सलामी ले न पाएं

वो देते हैं सलामी

जो स्वयं कर न पाएं

और बने बनाये मार्ग पे जाएँ

वो ना ले पाते सलामी

केवल दे पाते सलामी



वर्तमान के बनो स्तम्भ

और इतिहास रचना

करो प्रारंभ

ऐसा व्यक्तित्व करो धारण

कि दें तुमको वो सलामी

बिना किसी कारण

मौलिकता का धागा पकड़ो

दृष्टि हो केवल लक्ष्य पे

हो चाहे तुम्हारे विरुद्ध वो

या हो तुम्हारे पक्ष में



क्या करो ऐसा जो

दें तुझको वो सलामी

तेरे जज़्बे से हो प्रेरित

तेरी गाथा गाये दुनिया सारी?

स्वयं को पहले दे सलामी

स्वयं को करले प्रणाम

अपने भीतर के स्पंदन

को पहचान

और दे स्वयं को

स्वयं के विश्वास का

प्रमाण

जब होगा तू इसमें सक्षम

और पहचानेगा अपनी शक्ति

अपनी मौलिकता और स्वयं की भक्ति

तेरी नज़र में होगी एक

चमक , एक ऊर्जा

ऐसा हो जाएगा, न हो

कोई दूजा

तब दे स्वयं को सलामी

और हो तैयार

लेने के लिए

इस जग की सलामी

इतिहास की सलामी

वर्तमान की सलामी

भविष्य की सलामी

समय की सलामी

भाग्य की सलामी

विजय की सलामी

शिखर की सलामी

सलामी !

Monday, November 8, 2010

तान भ्रिकुटी Copyright ©


हो गया शंख्नाध भी

अश्व भी हिनहिना दिया

तनी भ्रिकुटी ने ही

शत्रु को डरा दिया

लहू ने भी दौड़ लगा दी

नस नस भी फूल गयी


अब तक स्वयं से जीत पा ने

के प्रयास करता रहा था मैं

साधना , एकांत और मौन का

धारक था मैं

सारी इन्द्रियों को करके वश में

त्रुटियाँ त्याग के हो

गया पारंगत

अब शत्रु को भ्रिकुटी भर से

ललकार सकने में हुआ सक्षम


अब युद्ध भूमि में खड़ा

मैं देख सकता पूरा दृश्य

लहू की बहती धाराओं

की सुगंध फैल रही चरों ओर

शत्रु के भय का स्वाद

चख रहा मैं अब

और उसके कम्पन में

थिरक रहा मैं अब


प्रतीक्षा , धैर्य और साहस

का रहा है अब तक डंका

अब ऐसा मेरा अट्टाहस

जैसे जला दी मैंने लंका

विजय के स्वाद का अनुभव

है अनुपम , अद्भुत

सारा परिश्षम, सारी महनत

सारी पीड़ा घुल गयी है

जीत के सेहरे और परचम

में सारी हार छुप गयी है


मत घबरा ऐ लड़ने वाले

तू भी सब कर पायेगा

विश्वास का धागा पकडे तो ही

तू विजय का सेहरा बुन पायेगा

हार को गले लगाके ही

तू उसपर विजय पायेगा

तो तान भ्रिकुटी

ललकार उसे ऐसे

जैसे सिंह दहाडा होगा

हिम्मत रख और विश्वास

के दम पे

पहन विजय का चोगा

पहन विजय का चोगा