Dreams

Monday, February 20, 2017

है ! Copyright (c)



हर धोखे के पीछे भरोसा है
किस्मत वालों ने ही किस्मत को कोसा है
बेस्वाद तो हम बना देते हैं 
ज़िंदगी ने तो सबके लिए ज़ायका परोसा है

जिसके पास गाड़ी नहीं
पैर हैं
जिसके पास पैर नहीं
कल्पना के पंख हैं
जिसके पास पंख नहीं
उसके पास आवाज़ है
जिसके पास आवाज़ नहीं
उसके पास हौंस्लों के शंख हैं

जिसके पास नज़र नहीं
नज़रिया है
जिसके पास नज़रिया नहीं
किताबें हैं, स्याही है
पन्ने हैं, ख धीया है
जिसके पास खड़िया नहीं
हाथ मे उसके तलवार है
जिसके पास तलवार नहीं
ज़ुबान की तेज़ी है, धार है

जिसका पास जंग नहीं
खुद से ही लड़ाई है
जिसके पास लड़ाई नहीं
पढ़ाई है
जिसके पास पढ़ाई नहीं
कढ़ाई है
रसोई है, स्वाद है
दुनिया को भोजन करवाने का गौरव है
भूख  और भरे पेट के बीच संवाद है

बस अपने उपहारों को 
देखने भर की बात है
नहीं तो उजालों मे भी
रात है
वरना 
देखो तो
मातम में भी बारात है
मातम में भी बारात है
मातम में भी बारात है 

Thursday, December 22, 2016

छुट्टियाँ आने वाली हैं (c) Copyright



छुट्टियाँ आने वाली हैं

काम से थोड़ा फ़ुर्सत है
पर मुझे अब मनुश्य बनने से छुट्टी चाहिए
थोड़ा खरगोश बनना है
थोड़ा चीता
या फल बन जाऊं
चाहे सेब
चाहे पपीता
मुझे ऐसी घुट्टी चाहिए
मनुष्य बनने से छुट्टी चाहिए

ना दायित्व के दायरे हों
ना इच्छाओं का जाल
ना सामाजिक अपेक्षाएं
ना मर्यादा का भाल
केवल रंग हो मुझमे
और सुगंध हो
हे प्रभु! ऐसा कुछ प्रबंध हो
भावनाओं और अपेक्षाओं से
ज़ख्मी चित्त पर 
ऐसी एक पट्टी चाहिए
मनुष्य बनने से छुट्टी चाहिए

बस धरती हो
नदी हो
बादल हों
आकाश हो
और अवकाश हो
ना कहीं से उदगम होने की इच्छा हो
ना किसी मंज़िल की तलाश हो
बस हवा बहे त्वचा पे शीतल
चारों ओर अपने
ऐसी खस की टट्टी चाहिए
मनुष्य बनने से छुट्टी चाहिए

और आपको?

Monday, November 14, 2016

कभी मुग़ल है कभी मोगली (c) अनुपम ध्यानी



कभी बादशाहों सा दिलदार होता
कभी जोगी सा है मदमस्त
कभी दानी हो जाए मन ये
कभी होता मौका परस्त
जो संस्कारों का चोगा पहने
डंके से बोलें हैं
वो या तो झूठे हैं
या अपने मन को ढंग से ना टटोले हैं
क्यूंकी मन तो एक ओर बहता नही 
होती इसकी फ़ितरत है हरदम दोगली
जो पहचाने इसको वो जानेगा
ये कभी मुग़ल है कभी मोगली

मन की करनी, 
कभी ना डरनी
कभी किसी की चुगली करनी
कभी दया का भाव समाना
कभी प्रेम मे लहू बहाना
कभी , कभी तो प्यार और नफ़रत को
एक पालने में ही सुलाना
कभी क्षमा की छतरी थामे
कभी भाले की नोक चुभाना
कभी करेले सी ज़ुबान को
गुड़ में घोल के ही दिखाना
जो मन के इस मदमस्त अश्व को
थाम लेगा
जिसने इसकी दौड़ रोक ली
वो पूरा कहलाएगा उस दिन
वो ही मुग़ल हो , वही मोगली


एक राह में  चलते चलते
मंज़िल तो मिल जाएगी
राह बदल और सोच बदल तो
हर राह महक जाएगी
कभी हो तिरछी, कभी हो सीधी
कभी हो मिर्ची, कभी हो मीठी
कभी कभी खटास मिलाके
ज़िंदगी मज़े से बीत जाएगी
मन तो अल्हड़ है
मन है चंचल
मन की नदी
कभी सब बहा ले  जाएगी
जिसने इसको वश मे करली
समझो उसने हर जीत भोग ली
मन तो मन है, मन का क्या है
कभी मुग़ल है, कभी मोगली
कभी मुग़ल है, कभी मोगली
कभी मुग़ल है, कभी मोगली

Thursday, June 9, 2016

पड़ती है !



नयी फसल जो रोपनी हो तो
पहले भूस पुरानी जलानी पड़ती है
ईर्ष्यालु की जलन भी पथिक
श्रम से अपने कमानी पड़ती है

धाराओं को मोड़ने की
चट्टानी ताक़त के लिए
जवानी अपनी लुटानी पड़ती है
पसीने को सम्मान मिलता ज़रूर
पर परिवर्तन के लिए
रक्त-धार तो बहानी पड़ती है

खड़ग की धार तेज़ हो
समय आने तक म्यान को ही
उसकी चमक बचानी पड़ती है
धैर्य ऐसी कड़वी औषधि है
समय आने तक हर विजयी को
चुप चाप चबानी पड़ती है
~© अनुपम ध्यानी


 

Tuesday, April 26, 2016

दिल से ही जीता जाता हर स्वयंवर (c) Copyright

 
 
 
दिमाग़ को चुनाव की अनुमति दी
दिल ने क्या बिगाड़ा ईश्वर
चुनौती का चयन करने वालों ने भी
दिल से ही जीता हर स्वयंवर

दिमाग़ को चुनने का ग़ुरूर है
दिल को बस बह जाने का फ़ितूर 
मय बनाने वाले ये नहीं समझे मगर
नशे के लिए तो दिल ही है मशहूर

ज़हन से मंज़िल बनती है
पर हौसले दिल दिया करते हैं
इश्क़ में दिमाग़ की नहीं चलती
वहाँ फ़ैसले दिल किया करते हैं

रणनीति सेनापति बनाते भले हैं
पर चुनौती शूरवीर दिया करते हैं
भूगोल राजा के हाथ लग जाते हैं
इतिहास स्वर्ण अक्षरों से अंकित, सेनानी किया करते हैं

समारोह बुद्धिजीवियों का माना लो अभी
सदियों तक तो मोहब्बतें हर याद रहेंगी
समाधियों के फूल मुरझा जाएँगे
मज़ारों की अगरबत्तियाँ ही याद रहेंगी

चुनाव, संदेह को जन्म देता 
दिल बहे है एक डगर
दिमाग़ बाँध बनाता नदी पर
दिल की धारा चट्टानें चीरे है मगर

दिमाग़ को चुनाव की अनुमति दी
दिल ने क्या बिगाड़ा ईश्वर
चुनौती का चयन करने वालों ने भी
दिल से ही जीता हर स्वयंवर

 
~©  अनुपम ध्यानी 

Monday, April 25, 2016

मैं अपना दिल किराए पर चढ़ाना चाहता हूँ (C) Copyright



मैं अपना दिल किराए पर चढ़ाना चाहता हूँ
किराए एकत्रित यादों से हुआ करेगा
यादें, जो तुम बनाओगे औरों के संग
मेरे दिल के उस कमरे में रख देना
जहाँ मेरी अपनी धूल चढ़ी यादों का किताब घर है
जब लौटाओ मेरे दिल को
तो याद रहे, हू-ब-हू वैसा ही लौटना जैसे दिया था
ना कोई कील का निशान, ना पुताई की परत
ना खिड़कियों के ही पल्ले खराब हों
ना दरवाज़ों की खूँटि खराब
बड़ी मेहनत से घर बनाया है
संभाल के रखिएगा जनाब

मेहमान आएँ तो शोर कम हो
आयें कुछ देर , बैठें फिर जाएं
कहीं मेरी यादों की कोठरी
के साँप, उन्हे डस ना जाएं

मैं अपना दिल किराए पर चढ़ाना चाहता हूँ
क्यूँकि, आजकल दिल होते कहाँ हैं लोगों के पास
जब हमने बनाया था दिल अपना घरौंदे सा
तब इतनी आबादी कहाँ थी
दिल होते थे सब के पास

दिल है, चाहे थोड़ा खंडहर सा
छत हो जाएगी तुम्हारी
यादें बटॉरोगे
और खर्च हमारा दिल होगा


Friday, April 22, 2016

लगे दिल किसी से भी ना (C) Copyright

 
 
दिल खुला हो सबके लिए
मगर लगे दिल किसी से भी ना
खुदा यह ही बस इक गुज़ारिश
यह बस मेरे दिल की इलतेजा

 
सब छूट जाते हैं
सफ़र में ज़िंदगी के
बस उम्मीद ही है जो
मिटे किसे से ना

 
बंधन बेड़ियाँ बने, इस से पहले
इश्क़ इबादत से बने सज़ा
अश्को के सैलबों से धुल जाए
चाँदनी मे हाथ पकड़ने का मज़ा
मेरे दिल, इस से पहले बना ले तू
शबनम के बूँदों सी अपनी अदा

 
तेरे टूटने की आवाज़
सदियों तक गूँजे
तुझे मज़ारों में
इस से पहले कोई पूजे
तो खुद-ब- खुद
दीवाने, हो जा फ़ना
खुदा यह ही बस इक गुज़ारिश
यह बस मेरे दिल की इलतेजा

 
दिल खुला हो सबके लिए
मगर लगे दिल किसी से भी ना
खुदा यह ही बस इक गुज़ारिश
यही बस मेरे दिल की इलतेजा


Monday, April 18, 2016

कोई बतलाए रे (C) Copyright

 
 
पुरुषार्थ की परिभाषा
नारित्व के दायरे
किसने बनाए रे?

इश्वर की मूरत
दानव की सूरत पे
मुखौटे किसने
चढ़ाए रे?

पाप की ज्वाला
धधके क्यूँ है
पुण्य का प्याला
हमेशा क्यूँ
छलकाए रे?

हर चीज़ को बाँटना क्यूँ है
कोई बतलाए रे?

सोच में तेरे
छेद है
इस बात का खुदा को भी खेद है
पर खुदा भी प्यारे
तूने ही बनाए रे.

सिद्धों में
गिद्धों में, अंतर
इच्छा भर का है
फिर सिद्धों को ही क्यूँ
प्रसिद्ध बनाए रे
ताकि हर ओर
लार टपकाते, माँस नोचते
गिद्ध मंडराएँ रे?

बुद्धि और करुणा में
शौर्य और अहिंसा में
किसे चुनें हम?
हरदम चुनाव को चुनौती ही
क्यूँ बनाए रे?

अंतर, भेद, चुनाव
के ही हरदम
क्यूँ भाले चलाए रे
मानव ही जब
सब बनाता
खुदा को ही
ढाल क्यूँ बनाए रे?

सब तो तूने राख किया है
फूँक दे सब जो
सामने तेरे आए रे
जब उत्तर ढूँढना ही नही है
फिर प्रश्न को भी
आग क्यूँ ना लगाए रे
मानव तू बड़ा चतुर है
सब को खेल बनाए रे.




Wednesday, April 13, 2016

युद्ध बुद्ध ( c) Copyright



जब जब युद्ध की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली
चुप्पी चाहिए हो जब सरकार से
तब प्रबुद्ध हो जाती है दिल्ली
जब स्थिरता चाहिए होती है
सुध बुध खो जाती है दिल्ली
जब जब युद्ध की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली

आधों से झुकती, पूरी दिल्ली
प्यादों से फूंकती, पूरी दिल्ली
कभी शौर्य होता था सीने में यहाँ
बिना दिल की, अब अधूरी दिल्ली
शहन्शाहों के तख्त सी
सिंहों सी दहाड़ती दिल्ली
ना जाने दिल इसका कहाँ खो गया
दुबक कर, सहमी, भीगी सी बिल्ली
दिल्ली

इमारतों से क्या होगा
धुएँ से ढ़क़ी हुई है काया
देश भर में भेद जन्मा इसने
खुद गठबंधन ही बस कमाया
सीमाओं पे बहे रक्त से
जेबें भरती है दिल्ली
लहू की गर्मी होती थी कभी इसमे
अब बस बर्फ की सिल्ली है दिल्ली
जब जब युद्द की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली

~ अनुपम ध्यानी





Thursday, February 4, 2016

मेरी कविता ढोती है ~ © Copyright



जो कहते हैं, मेरी कविता
भारी भरकम शब्दों से लैस होती है
उसमे मिठास कम होती है
उन्हे नहीं पता 
मेरी कविता किस किस का भार ढोती है

जब घर लौटे सैनिक के ताबूत पर
माँ रोती है
उन आँसुओं का भार 
मेरी कविता ढोती है

जब राष्ट्रा निर्माण के लिए
एक सिंग खड़ा अकेला
और बाकी सब की आवाज़
उसके खिलाफ एक हथियार होती है
मेरी कविता उस सिंग
की दहाड़ होती है

जब पिता के कंधे
झुका दें बेटे के कर्म
पाप से रंगे उसके दुष्कर्म
उसे हर बार मुआफ़ करने की
शक्ति नही होती है
उसे क्षमा करने का भार
मेरी कविता ढोती है

जब चट्टानें खड़ी हों
हर मोड़ पर
जब प्रश्न चिन्ह लग जाए
तुम्हारे ज़ोर पर
जब धराशाही हर
उम्मीद होती है
तब कविया मेरी
उन चट्टानो को चीरती
धार होती है

जब प्रशंसा दुर्लभ हो
और निंदा हर बार होती है
श्रम का फल ना मिलने पर भी
कर्मठता तेरी अपार होती है
उस जुझारू तेरी लगन को
मेरी कविता दंडवत हो,
उसे प्रणाम करती 
एक ललकार होती होती है

दयनीय, दंडनीय
घृणित, निंदनीय
जब संसार से ही
मानवता खोती है
उस पतन का भार
मेरी कविता ढोती है
तो भारी हो या भरकम हो
उन मानवता के शवों को
लयबद्ध करने की ज़िम्मेदारी
मेरी कविता की होती है
कड़वाहट से नहा के 
पंक्तियों में मेरी मिठास कम होती है
क्यूँकि मेरे शब्द, पंक्तियाँ, मुक्तक, कविता
कई कई भार ढोती है
कई कई भार ढोती है
~ ©  अनुपम ध्यानी 

Monday, November 23, 2015

हवा ही बदनाम है (C) Copyright



हवा ही बदनाम है
इतिहास बदल जाते है
ख़ूँख़ार इरादों से
सियासतें ढह जाती हैं
अधूरे वादों से
तलवार की धार पे लगा लहू
गवाही देता रहे प्यास की
गद्दी के नशे की, तख्त की आस की
इतिहास जानता है
यह इंसानों का ही काम है
पर इसके लिए भी , बस
हवा ही बदनाम है

शीश कट गये, 
तख्त पलट गये
कई कई गुनाह
यूँ ही घट गये
पर इल्ज़ाम लगाए
जब जब इतिहास ने
तो उम्मीदवार 
किसी पन्ने में छाँट गये
रक्त ही इतिहास के पन्नो
की स्याही, लहू ही उसका दाम है
पर इसके लिए भी, बस
हवा ही बदनाम है

पूर्वाई बन बन हवा
प्रेमिका की लट उलझाए
तूफान बनकर अश्वों
पर वीरों को सवारी करवाए
रेगिस्तान की रेत भी
इसी हवा की गुलाम है
पवन रूप मे सदियों 
से जो परिंदों को झुलाए
मौत का संदेश लाते ही
वो बदनाम हो जाए
पूर्वाई से फूँक बनी
तो सब का इसपर इल्ज़ाम है
सब के लिए , बस
हवा ही बदनाम है 

Thursday, November 19, 2015

मुझे मशालें रास आती हैं (c) Copyright



मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं
लट्ठ के छोर पर एक पवित्र ज्वाला
अराजकता के तांडव का ध्वज
दिए की भयभीत लौ का उत्तर
मैं नहीं मानता कमज़ोरियों में
मुझे उछालें रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं

प्रतीक दिया है यदि शांति का
मशाल चिह्न हैं धधकति क्रांति का
दीप यदि आशा की बांग है
मशाल आशा से परे, एक छलाँग है
मुरझाई दिए की बाती 
पवन का वेग नहीं सहन कर पाती
मशाल हवा के संग 
एक अनूठा नृत्या-निर्वाण है
चुप्पी साधा दिया,
कमान में फँसा हुआ
जैसे एक बान हैं
मशाल अंधेरे की ओर बढ़ती लपट
के प्राण हैं
मैं नहीं मानता ढालों में
मुझे भाले की गूँज रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं

जो लौ जले और अंधकार पर ना दे धावा
बस करे आमरण अनशन
ऐसी लौ भयभीत है
जो लौ क्रांति लाए 
वो ही विजय गीत है
मशालें अंधेरों से सवाल नहीं करती
केवल जवाब देती है
दिया प्रश्नचिह्न सा मुरझाता है
फिर भी ऐतिहासिक कहलाता है
मैं नहीं मानता सवालों में
मुझे उत्तर की झनक रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं . 

Monday, August 24, 2015

गुलाबी (c) Copyright

 
 
 
 
कर्तव्य और धर्म
प्रेम और कर्म
के मध्य एक
गुलाबी और नर्म
हिस्सा है
जिसका यह किस्सा है
जिसकी काया नहीं
जिसकी छाया भी नहीं
जो मूलाधार और सहस्रार
के बीच कहीं खो जाता है
जिसे कोई छू नहीं पाता है
जो तुम्हारे अस्तित्व का
निचोड़ है
तुम्हारी हँसी भी है
पीड़ा की मरोड़ है
जो कर्म और धर्म के
बोझ से परे है
जो ना सुन्न होता है
ना मृत्यु से डरे है
जो मर्यादा नहीं जानता
शाही चाल चलता है
जो प्यादा नहीं जानता
वो गुलाबी पंखुड़ी
हृदय नहीं है
सूर्योदय नही है
ना घनी रात है
ना कायनात है
वो बस है.
वो गुलाबी धधकता अंगारा
ज्वाला है
जिसे प्रत्येक प्राणी ने भीतर
संभाला है
वो विवेक नहीं है
विजयी अभिषेक नहीं है
वो प्राण है
और वो प्राण
तुम्हारे लिए जीवित है
आ जाओ.. मिल जायें
संग खिल जाएं

Thursday, August 13, 2015

प्रतिष्ठावान सावधान (c) Copyright

 
 
 
प्रतिष्ठावान सावधान
श्रमिक खड़े हैं
चुनौती देने
झूठी प्रतिष्ठा के सवारों को
धर्म के स्वघोषित ठेकेदारी
और सामाजिक काठ कबाड़ों को
भस्म करने आए हैं
श्रमिक के लहू से बनी
इन समृद्धि की नकली दीवारों को
मेरी पंक्तियाँ चिंगारी देंगी
इन गुस्सैल सुर्ख अंगारों को
गीत बनेंगी मेरी पंक्ति
श्रम बनेगा राष्ट्र गान
श्रापित श्रमिक को मिल
जाएगा फिर से जीवन दान
प्रतिष्ठावान सावधान
 

फिर गर्जेंगे सब्बल,
फावड़े, तसले और कुदाल
जिस पसीने ने नीव धरी
प्रतिष्ठा की
उसकी चोट के वार को
ज़रा संभाल
झूठे मान पे टिकी
सत्ताएं हिल जाएँगी
जो श्रम के पसीने से
ना सिंची हों वो
व्यवस्थाएँ मिट्टी में
मिल जाएँगी
हाथ ना मैले करे जो
और बन जाए यूँ ही प्रधान
ऐसी पगड़ी को ठोकर, कह दो
प्रतिष्ठावान सावधान
 

युगों योगों तक राज किया है
ऐसे नकली समृद्धों ने
हंसों को ही धर दबोचा
इन लहू चूसते गिद्धों ने
पर सिखाया हमे ही झुकना
दादा, परदादा, हमारे ही वृद्धों नें
और नीति, न्याय के पोतों में
अंकित किया ये भेद
खरीदे हुए ही सिद्धों नें
जो श्रम करे वो ही अब
मान पाए
जो विलासी अलसाए ठूंठ बने हैं
पशु ही अब कहलाएँ
परिश्रम ही प्रगति
श्रम ही अब धाम
महनती ही पुजारी
मेहनत ही भगवान
प्रतिष्ठावान
सावधान
प्रतिष्ठावान
सावधान

Tuesday, July 28, 2015

राख बनूँ, धूल नहीं ! (c) Copyright




राख बनूँ,
धूल नहीं
लंगर की डोर बनूँ,
फंदे की झूल नहीं
विपरीत बहुँ,
अनुकूल नहीं
राख बनूँ,
धूल नहीं

तीखा जीवित काँटा बनूँ
शवों पर निर्जीव फूल नहीं
कोरा पन्ना बनूँ
इतिहास की भूल नहीं
इंक़लाब बनूँ
मक़बूल नहीं
राख बनूँ
धूल नहीं

वीरगति का लहु बनूँ
कायरता का त्रिशूल नहीं
चुनाव का इनकार बनूँ
दबाव का क़ुबूल नहीं
चेतना का बीज बनूँ
विवेकहीन मूल नहीं
राख बनूँ मैं
धूल नहीं
राख बनूँ मैं
धूल नहीं

Monday, July 20, 2015

रेत पे अंकित पदचिन्हों की .. ! (c) Copyright

 
 
 
बात नहीं है जूतों की
बात तो है बस कदमों की
रेत पे अंकित पदचिन्हों की
समय के साथ मुक़दमों की
 

कीचड़ में भी
साख जमाएं देखो
कमल कैसे मुस्काये
छीटें उसे भिगाना चाहें
पर वो गीला भी ना हो पाए
पुष्पराज की स्थिरता उसकी शोभा
शबनम की बूँदें केवल अलंकार
ना बदले उसकी काया
ना बदले उसका आकार
बात नहीं है शबनम की
बात तो है बस पदमों की
रेत पे अंकित पदचिन्हों की
समय के साथ मुक़दमों की
 

तूफ़ानों से लड़ती कश्ति
डगमग डगमग थर्राये
माझी संकल्पी हो तो
सागर का सीना भी चिर जाए
सागर अपनी लहरों से
भले उसे डरा जाए
पर जिस नाव का चप्पू
विश्वास भरा हो
लहरे वो हरा जाए
बात नहीं है
तूफ़ानों से मिलते इन सदमों की
केवल रेत पे अंकित पदचिन्हों की
समय के साथ मुक़दमों की

Monday, July 13, 2015

बीज थे ~ © copyright





उन्होने हमे दफ़नाना चाहा
पर हम तो बीज थे
दफ़्न होके भी उग जाते
वो उगते ही काट डालते
हम कटके भी उग जाते
उन सबको हमारी छाया
से डर लगता था शायद
तने तने को हमारे
वो झुकाया करते
हम फिर तन तनाके तन जाते
उनके दिल बार बार काट काट के
भी ना पसीजते
उन्हे कुछ और सोचना था
पर उन्होने हमे दफ़ना दिया
और हम ~ बीज थे
उन्होने हमे दफ़नाना चाहा
पर हम तो बीज थे.

 




Wednesday, July 8, 2015

जाना है अभी ... Copyright



आसमान गिर रहे हैं जो
उनका भार उठाना है अभी
धसती मानवता को तुझे
धरातल तक फिर से लाना है अभी
बवंडर बनते हवाओं के वेग को
वश में कर जाना है अभी
धाराओं को मोड़ना है तुझे
पानी हो अपनी गति से बहाना है अभी
भस्म करते ज्वालामुखी के मूह पर
शीतल गंगाजल गिराना है अभी
थकना विकल्प नहीं है तेरे लिए
तुझे बहुत दूर जाना है अभी
 
 
बहुत मुस्कानें बिखेरनी है तुझे
बहुतों को गले लगाना है अभी
शोर है जो इतना उस से ही धुन छेड़नी है तुझे
हर एक स्पंदन को एक सुर में लाना है अभी
बुझना धर्म नही है तेरा
तुझे जग को चमकाना है अभी
इस धरती, इस आकाश इस समंदर को ही नहीं
पूरे ब्रह्मांड में अपना रंग चढ़ाना है अभी
थकना विकल्प नहीं है तेरे लिए
तुझे बहुत दूर जाना है अभी
 
 
जो रूठ गये हैं तुमसे
तुझे उन्हे मानना है अभी
जो ना उम्मीद से निरुत्तर हैं
उन्हे उम्मीद का उत्तर पहुँचना है अभी
सोए हुए विवेक को सबमें
फिर से जगाना है अभी
इंद्रधनुष के छोर जो बिछड़े हुए हैं
तुझे उन्हे फिर से मिलवाना है अभी
हार गया है कोई जो
उसे फिर से उम्मीद दिखलाना है अभी
थकना विकल्प नहीं है तेरे लिए
तुझे बहुत दूर जाना है अभी
 
 
पतझड़ के पत्तों में रंग भरके
फिरसे  बसंत बनाना है अभी
घनघोर भयावह रातों को
अपने तेज से चमकाना है अभी
निष्प्रेम हृदय में पीड़ा हटा
प्रेम के पुष्प उगाना है अभी
भाई, पति, बेटे, यार दोस्त का
धर्म तुझे निभाना है अभी
बेरंग महफिलें फीकी पड़ी हैं देख
उसे अपनी कूची से रंगाना है अभी
थकना विकल्प नहीं है तेरे लिए
तुझे बहुत दूर जाना है अभी
थकना विकल्प नहीं है तेरे लिए
तुझे बहुत दूर जाना है अभी