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Tuesday, May 17, 2011

समभोग ! Copyright ©


हाड मॉस के पुतले हम और
हाड मॉस का अपना धंधा
देह धर्म और ईमान की बोली
काला , कुटिल और गन्दा
समभोग को करके व्यक्त परदे पर
उसके तात्पर्य को भूल गए
अधनंगे शरीरों पे लार टपका के
काम , क्रोध में झूल गए
कामसूत्र के मूल मंत्र को हमने
यूँ ही भुला दिया
नग्न नर-नारी को बस एक शय्या में
सुला दिया



समभोग है जुड़ना आत्मा का परमात्मा से
शिव-शक्ति के मिलन से प्रकट होती उस आत्मा से
जब टकराए एक निरंतर गतिमय शक्ति
एक निरंतर स्थिर काया से
ले जो ऊर्जा जन्म इन से, दूर हो जो इस माया से
देह मिले या मिले मन
न मिलें आत्मा तो यह माया है अधूरी
जब समां जाओ तुम मुझमें और मैं तुझमे
तब होती यह यात्रा पूरी
जैसे गंगा- जमुना मटमैली सी जुड़ जाएँ
संगम करते उठ जाएँ
वैसे समभोग की हो कामना
हो तब तक परमात्मा से अपनी दूरी



मंथन करके अमृत निकले
निकले गीता सार
इस मिलन से त्रिदेव प्रकट हों
जन्म ले शक्ति अपार
मूलाधार चमके स्वयं का
उत्तेजित हो मन इतना
शिव की भाँती जटाओं से निकले गंगा की धार
समभोग में मोक्ष की शक्ति
मोक्ष परमात्मा से परिचय
परिचय स्वयं का देवों से और
स्वयं पे स्वयं की विजय



समभोग मात्र से , समय को जकड़ा
अपने अन्दर ब्रह्माण्ड को पकड़ा
उक शक्ति से रचे वेद और रची गयी
यह सभ्यता
उससे उत्पन्न भ्रूण हुआ जो
इतिहास अपना गया रचा
इस मिलन से भूगोल बदल आये
कई सम्राट
स्वयं का स्वयं से समभोग हुआ तो
निकली शक्ति विराट



स्वयं से स्वयं का समभोग
रोक नहीं पाओगे
उस शक्ति को केंद्र बना के
बुद्ध हो जाओगे
यह शक्ति पहचानो तो
भूलोगे विलास , मोह, माया ओर भोग
बस अपना लोगे इस मार्ग को
करोगे जब स्वयं का स्वयं से समभोग
फिर स्वयं का आत्मा से समभोग
फिर आत्मा का परमात्मा से समभोग!