Dreams

Monday, July 24, 2017

प्रतिमा (c) Copyright


नित्य नीति 
नियम ध्यान
और कर्मठता की
मूरत तू
सौम्यता और सौंदर्य
की प्रतिमा 
अप्सरा सी सूरत तू
हर प्रेमी की कल्पना
में तेरी ही
परछाई है
ब्रह्मचारी के मन में भी
साधना तोड़ती भावना
तूने ही जगाई है
कवि स्याही से शब्द बुने
या लहू से अपने वाक्य गढ़े
प्रेमिका के वियोग का
या फिर पंक्ति में ही अश्क चड़े
ये धधक भी उसके मन में
तूने ही जालई है
जिस लौ के पीछे
हर पतंगा भस्म हुआ है
या फिर उसकी काया ही 
मुरझाई है
वो नष्ट करती दावानल
भी तूने ही लगाई है
रूप और यौवन से अपने
तूने कई नावें डुबॉयिन हैं
ढक ले अपना रूप ओ सजनी
उसमे ही
इस दुनिया की भलाई है 
ढक ले अपना रूप ओ सजनी
उसमे ही
इस दुनिया की भलाई है 

1 comment:

संजय भास्‍कर said...

ऐसा कमाल का लिखा है आपने कि पढ़ते समय एक बार भी ले बाधित नहीं हुआ और भाव तो सीधे मन तक पहुंचे !!