Dreams

Tuesday, May 23, 2017

गर तलाश तेरी जारी है (c) Copyright



“काश” की नहीं ज़रूरत तुझे
गर तलाश तेरी जारी है
“शब्बाश” की नहीं ज़रूरत तुझे
गर हर मशक्कत में तेरे
खुद्दारी है

हर जंग जो लड़ेगा तू, छोटी है
हर खून की बूँद में 
तेरे गर पसीने की तय्यरी है
हर बरछी हर भाला हल्का है 
गर ढाल तेरी भारी है
“काश” की नहीं ज़रूरत तुझे
गर तलाश तेरी जारी है

गिरे तू तो सम्भल जाएगा
हर मुक़ाम पे खुद को
सीना ताने खड़ा पाएगा
हार की मार, वक़्त की धार
से घबराना छोड़ दे
क़ामयाबी ने जो तेरी 
नज़र उतार है
“”काश” की नहीं ज़रूरत तुझे
गर तलाश तेरी जारी है

Monday, February 20, 2017

है ! Copyright (c)



हर धोखे के पीछे भरोसा है
किस्मत वालों ने ही किस्मत को कोसा है
बेस्वाद तो हम बना देते हैं 
ज़िंदगी ने तो सबके लिए ज़ायका परोसा है

जिसके पास गाड़ी नहीं
पैर हैं
जिसके पास पैर नहीं
कल्पना के पंख हैं
जिसके पास पंख नहीं
उसके पास आवाज़ है
जिसके पास आवाज़ नहीं
उसके पास हौंस्लों के शंख हैं

जिसके पास नज़र नहीं
नज़रिया है
जिसके पास नज़रिया नहीं
किताबें हैं, स्याही है
पन्ने हैं, ख धीया है
जिसके पास खड़िया नहीं
हाथ मे उसके तलवार है
जिसके पास तलवार नहीं
ज़ुबान की तेज़ी है, धार है

जिसका पास जंग नहीं
खुद से ही लड़ाई है
जिसके पास लड़ाई नहीं
पढ़ाई है
जिसके पास पढ़ाई नहीं
कढ़ाई है
रसोई है, स्वाद है
दुनिया को भोजन करवाने का गौरव है
भूख  और भरे पेट के बीच संवाद है

बस अपने उपहारों को 
देखने भर की बात है
नहीं तो उजालों मे भी
रात है
वरना 
देखो तो
मातम में भी बारात है
मातम में भी बारात है
मातम में भी बारात है 

Thursday, December 22, 2016

छुट्टियाँ आने वाली हैं (c) Copyright



छुट्टियाँ आने वाली हैं

काम से थोड़ा फ़ुर्सत है
पर मुझे अब मनुश्य बनने से छुट्टी चाहिए
थोड़ा खरगोश बनना है
थोड़ा चीता
या फल बन जाऊं
चाहे सेब
चाहे पपीता
मुझे ऐसी घुट्टी चाहिए
मनुष्य बनने से छुट्टी चाहिए

ना दायित्व के दायरे हों
ना इच्छाओं का जाल
ना सामाजिक अपेक्षाएं
ना मर्यादा का भाल
केवल रंग हो मुझमे
और सुगंध हो
हे प्रभु! ऐसा कुछ प्रबंध हो
भावनाओं और अपेक्षाओं से
ज़ख्मी चित्त पर 
ऐसी एक पट्टी चाहिए
मनुष्य बनने से छुट्टी चाहिए

बस धरती हो
नदी हो
बादल हों
आकाश हो
और अवकाश हो
ना कहीं से उदगम होने की इच्छा हो
ना किसी मंज़िल की तलाश हो
बस हवा बहे त्वचा पे शीतल
चारों ओर अपने
ऐसी खस की टट्टी चाहिए
मनुष्य बनने से छुट्टी चाहिए

और आपको?

Monday, November 14, 2016

कभी मुग़ल है कभी मोगली (c) अनुपम ध्यानी



कभी बादशाहों सा दिलदार होता
कभी जोगी सा है मदमस्त
कभी दानी हो जाए मन ये
कभी होता मौका परस्त
जो संस्कारों का चोगा पहने
डंके से बोलें हैं
वो या तो झूठे हैं
या अपने मन को ढंग से ना टटोले हैं
क्यूंकी मन तो एक ओर बहता नही 
होती इसकी फ़ितरत है हरदम दोगली
जो पहचाने इसको वो जानेगा
ये कभी मुग़ल है कभी मोगली

मन की करनी, 
कभी ना डरनी
कभी किसी की चुगली करनी
कभी दया का भाव समाना
कभी प्रेम मे लहू बहाना
कभी , कभी तो प्यार और नफ़रत को
एक पालने में ही सुलाना
कभी क्षमा की छतरी थामे
कभी भाले की नोक चुभाना
कभी करेले सी ज़ुबान को
गुड़ में घोल के ही दिखाना
जो मन के इस मदमस्त अश्व को
थाम लेगा
जिसने इसकी दौड़ रोक ली
वो पूरा कहलाएगा उस दिन
वो ही मुग़ल हो , वही मोगली


एक राह में  चलते चलते
मंज़िल तो मिल जाएगी
राह बदल और सोच बदल तो
हर राह महक जाएगी
कभी हो तिरछी, कभी हो सीधी
कभी हो मिर्ची, कभी हो मीठी
कभी कभी खटास मिलाके
ज़िंदगी मज़े से बीत जाएगी
मन तो अल्हड़ है
मन है चंचल
मन की नदी
कभी सब बहा ले  जाएगी
जिसने इसको वश मे करली
समझो उसने हर जीत भोग ली
मन तो मन है, मन का क्या है
कभी मुग़ल है, कभी मोगली
कभी मुग़ल है, कभी मोगली
कभी मुग़ल है, कभी मोगली

Thursday, June 9, 2016

पड़ती है !



नयी फसल जो रोपनी हो तो
पहले भूस पुरानी जलानी पड़ती है
ईर्ष्यालु की जलन भी पथिक
श्रम से अपने कमानी पड़ती है

धाराओं को मोड़ने की
चट्टानी ताक़त के लिए
जवानी अपनी लुटानी पड़ती है
पसीने को सम्मान मिलता ज़रूर
पर परिवर्तन के लिए
रक्त-धार तो बहानी पड़ती है

खड़ग की धार तेज़ हो
समय आने तक म्यान को ही
उसकी चमक बचानी पड़ती है
धैर्य ऐसी कड़वी औषधि है
समय आने तक हर विजयी को
चुप चाप चबानी पड़ती है
~© अनुपम ध्यानी