Dreams

Thursday, November 19, 2015

मुझे मशालें रास आती हैं (c) Copyright



मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं
लट्ठ के छोर पर एक पवित्र ज्वाला
अराजकता के तांडव का ध्वज
दिए की भयभीत लौ का उत्तर
मैं नहीं मानता कमज़ोरियों में
मुझे उछालें रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं

प्रतीक दिया है यदि शांति का
मशाल चिह्न हैं धधकति क्रांति का
दीप यदि आशा की बांग है
मशाल आशा से परे, एक छलाँग है
मुरझाई दिए की बाती 
पवन का वेग नहीं सहन कर पाती
मशाल हवा के संग 
एक अनूठा नृत्या-निर्वाण है
चुप्पी साधा दिया,
कमान में फँसा हुआ
जैसे एक बान हैं
मशाल अंधेरे की ओर बढ़ती लपट
के प्राण हैं
मैं नहीं मानता ढालों में
मुझे भाले की गूँज रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं

जो लौ जले और अंधकार पर ना दे धावा
बस करे आमरण अनशन
ऐसी लौ भयभीत है
जो लौ क्रांति लाए 
वो ही विजय गीत है
मशालें अंधेरों से सवाल नहीं करती
केवल जवाब देती है
दिया प्रश्नचिह्न सा मुरझाता है
फिर भी ऐतिहासिक कहलाता है
मैं नहीं मानता सवालों में
मुझे उत्तर की झनक रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं . 

2 comments:

Kavita Rawat said...

क्रांति का बिगुल है धधकता मशाल ..
बहुत सुन्दर ...

Mukesh Kumar Sinha said...

बेहतरीन कविता ......