Dreams

Monday, April 18, 2016

कोई बतलाए रे (C) Copyright

 
 
पुरुषार्थ की परिभाषा
नारित्व के दायरे
किसने बनाए रे?

इश्वर की मूरत
दानव की सूरत पे
मुखौटे किसने
चढ़ाए रे?

पाप की ज्वाला
धधके क्यूँ है
पुण्य का प्याला
हमेशा क्यूँ
छलकाए रे?

हर चीज़ को बाँटना क्यूँ है
कोई बतलाए रे?

सोच में तेरे
छेद है
इस बात का खुदा को भी खेद है
पर खुदा भी प्यारे
तूने ही बनाए रे.

सिद्धों में
गिद्धों में, अंतर
इच्छा भर का है
फिर सिद्धों को ही क्यूँ
प्रसिद्ध बनाए रे
ताकि हर ओर
लार टपकाते, माँस नोचते
गिद्ध मंडराएँ रे?

बुद्धि और करुणा में
शौर्य और अहिंसा में
किसे चुनें हम?
हरदम चुनाव को चुनौती ही
क्यूँ बनाए रे?

अंतर, भेद, चुनाव
के ही हरदम
क्यूँ भाले चलाए रे
मानव ही जब
सब बनाता
खुदा को ही
ढाल क्यूँ बनाए रे?

सब तो तूने राख किया है
फूँक दे सब जो
सामने तेरे आए रे
जब उत्तर ढूँढना ही नही है
फिर प्रश्न को भी
आग क्यूँ ना लगाए रे
मानव तू बड़ा चतुर है
सब को खेल बनाए रे.




Wednesday, April 13, 2016

युद्ध बुद्ध ( c) Copyright



जब जब युद्ध की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली
चुप्पी चाहिए हो जब सरकार से
तब प्रबुद्ध हो जाती है दिल्ली
जब स्थिरता चाहिए होती है
सुध बुध खो जाती है दिल्ली
जब जब युद्ध की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली

आधों से झुकती, पूरी दिल्ली
प्यादों से फूंकती, पूरी दिल्ली
कभी शौर्य होता था सीने में यहाँ
बिना दिल की, अब अधूरी दिल्ली
शहन्शाहों के तख्त सी
सिंहों सी दहाड़ती दिल्ली
ना जाने दिल इसका कहाँ खो गया
दुबक कर, सहमी, भीगी सी बिल्ली
दिल्ली

इमारतों से क्या होगा
धुएँ से ढ़क़ी हुई है काया
देश भर में भेद जन्मा इसने
खुद गठबंधन ही बस कमाया
सीमाओं पे बहे रक्त से
जेबें भरती है दिल्ली
लहू की गर्मी होती थी कभी इसमे
अब बस बर्फ की सिल्ली है दिल्ली
जब जब युद्द की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली

~ अनुपम ध्यानी





Thursday, February 4, 2016

मेरी कविता ढोती है ~ © Copyright



जो कहते हैं, मेरी कविता
भारी भरकम शब्दों से लैस होती है
उसमे मिठास कम होती है
उन्हे नहीं पता 
मेरी कविता किस किस का भार ढोती है

जब घर लौटे सैनिक के ताबूत पर
माँ रोती है
उन आँसुओं का भार 
मेरी कविता ढोती है

जब राष्ट्रा निर्माण के लिए
एक सिंग खड़ा अकेला
और बाकी सब की आवाज़
उसके खिलाफ एक हथियार होती है
मेरी कविता उस सिंग
की दहाड़ होती है

जब पिता के कंधे
झुका दें बेटे के कर्म
पाप से रंगे उसके दुष्कर्म
उसे हर बार मुआफ़ करने की
शक्ति नही होती है
उसे क्षमा करने का भार
मेरी कविता ढोती है

जब चट्टानें खड़ी हों
हर मोड़ पर
जब प्रश्न चिन्ह लग जाए
तुम्हारे ज़ोर पर
जब धराशाही हर
उम्मीद होती है
तब कविया मेरी
उन चट्टानो को चीरती
धार होती है

जब प्रशंसा दुर्लभ हो
और निंदा हर बार होती है
श्रम का फल ना मिलने पर भी
कर्मठता तेरी अपार होती है
उस जुझारू तेरी लगन को
मेरी कविता दंडवत हो,
उसे प्रणाम करती 
एक ललकार होती होती है

दयनीय, दंडनीय
घृणित, निंदनीय
जब संसार से ही
मानवता खोती है
उस पतन का भार
मेरी कविता ढोती है
तो भारी हो या भरकम हो
उन मानवता के शवों को
लयबद्ध करने की ज़िम्मेदारी
मेरी कविता की होती है
कड़वाहट से नहा के 
पंक्तियों में मेरी मिठास कम होती है
क्यूँकि मेरे शब्द, पंक्तियाँ, मुक्तक, कविता
कई कई भार ढोती है
कई कई भार ढोती है
~ ©  अनुपम ध्यानी 

Monday, November 23, 2015

हवा ही बदनाम है (C) Copyright



हवा ही बदनाम है
इतिहास बदल जाते है
ख़ूँख़ार इरादों से
सियासतें ढह जाती हैं
अधूरे वादों से
तलवार की धार पे लगा लहू
गवाही देता रहे प्यास की
गद्दी के नशे की, तख्त की आस की
इतिहास जानता है
यह इंसानों का ही काम है
पर इसके लिए भी , बस
हवा ही बदनाम है

शीश कट गये, 
तख्त पलट गये
कई कई गुनाह
यूँ ही घट गये
पर इल्ज़ाम लगाए
जब जब इतिहास ने
तो उम्मीदवार 
किसी पन्ने में छाँट गये
रक्त ही इतिहास के पन्नो
की स्याही, लहू ही उसका दाम है
पर इसके लिए भी, बस
हवा ही बदनाम है

पूर्वाई बन बन हवा
प्रेमिका की लट उलझाए
तूफान बनकर अश्वों
पर वीरों को सवारी करवाए
रेगिस्तान की रेत भी
इसी हवा की गुलाम है
पवन रूप मे सदियों 
से जो परिंदों को झुलाए
मौत का संदेश लाते ही
वो बदनाम हो जाए
पूर्वाई से फूँक बनी
तो सब का इसपर इल्ज़ाम है
सब के लिए , बस
हवा ही बदनाम है 

Thursday, November 19, 2015

मुझे मशालें रास आती हैं (c) Copyright



मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं
लट्ठ के छोर पर एक पवित्र ज्वाला
अराजकता के तांडव का ध्वज
दिए की भयभीत लौ का उत्तर
मैं नहीं मानता कमज़ोरियों में
मुझे उछालें रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं

प्रतीक दिया है यदि शांति का
मशाल चिह्न हैं धधकति क्रांति का
दीप यदि आशा की बांग है
मशाल आशा से परे, एक छलाँग है
मुरझाई दिए की बाती 
पवन का वेग नहीं सहन कर पाती
मशाल हवा के संग 
एक अनूठा नृत्या-निर्वाण है
चुप्पी साधा दिया,
कमान में फँसा हुआ
जैसे एक बान हैं
मशाल अंधेरे की ओर बढ़ती लपट
के प्राण हैं
मैं नहीं मानता ढालों में
मुझे भाले की गूँज रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं

जो लौ जले और अंधकार पर ना दे धावा
बस करे आमरण अनशन
ऐसी लौ भयभीत है
जो लौ क्रांति लाए 
वो ही विजय गीत है
मशालें अंधेरों से सवाल नहीं करती
केवल जवाब देती है
दिया प्रश्नचिह्न सा मुरझाता है
फिर भी ऐतिहासिक कहलाता है
मैं नहीं मानता सवालों में
मुझे उत्तर की झनक रास आती हैं
मैं नहीं मानता दियों में
मुझे मशालें रास आती हैं .