Dreams

Monday, April 25, 2016

मैं अपना दिल किराए पर चढ़ाना चाहता हूँ (C) Copyright



मैं अपना दिल किराए पर चढ़ाना चाहता हूँ
किराए एकत्रित यादों से हुआ करेगा
यादें, जो तुम बनाओगे औरों के संग
मेरे दिल के उस कमरे में रख देना
जहाँ मेरी अपनी धूल चढ़ी यादों का किताब घर है
जब लौटाओ मेरे दिल को
तो याद रहे, हू-ब-हू वैसा ही लौटना जैसे दिया था
ना कोई कील का निशान, ना पुताई की परत
ना खिड़कियों के ही पल्ले खराब हों
ना दरवाज़ों की खूँटि खराब
बड़ी मेहनत से घर बनाया है
संभाल के रखिएगा जनाब

मेहमान आएँ तो शोर कम हो
आयें कुछ देर , बैठें फिर जाएं
कहीं मेरी यादों की कोठरी
के साँप, उन्हे डस ना जाएं

मैं अपना दिल किराए पर चढ़ाना चाहता हूँ
क्यूँकि, आजकल दिल होते कहाँ हैं लोगों के पास
जब हमने बनाया था दिल अपना घरौंदे सा
तब इतनी आबादी कहाँ थी
दिल होते थे सब के पास

दिल है, चाहे थोड़ा खंडहर सा
छत हो जाएगी तुम्हारी
यादें बटॉरोगे
और खर्च हमारा दिल होगा


Friday, April 22, 2016

लगे दिल किसी से भी ना (C) Copyright

 
 
दिल खुला हो सबके लिए
मगर लगे दिल किसी से भी ना
खुदा यह ही बस इक गुज़ारिश
यह बस मेरे दिल की इलतेजा

 
सब छूट जाते हैं
सफ़र में ज़िंदगी के
बस उम्मीद ही है जो
मिटे किसे से ना

 
बंधन बेड़ियाँ बने, इस से पहले
इश्क़ इबादत से बने सज़ा
अश्को के सैलबों से धुल जाए
चाँदनी मे हाथ पकड़ने का मज़ा
मेरे दिल, इस से पहले बना ले तू
शबनम के बूँदों सी अपनी अदा

 
तेरे टूटने की आवाज़
सदियों तक गूँजे
तुझे मज़ारों में
इस से पहले कोई पूजे
तो खुद-ब- खुद
दीवाने, हो जा फ़ना
खुदा यह ही बस इक गुज़ारिश
यह बस मेरे दिल की इलतेजा

 
दिल खुला हो सबके लिए
मगर लगे दिल किसी से भी ना
खुदा यह ही बस इक गुज़ारिश
यही बस मेरे दिल की इलतेजा


Monday, April 18, 2016

कोई बतलाए रे (C) Copyright

 
 
पुरुषार्थ की परिभाषा
नारित्व के दायरे
किसने बनाए रे?

इश्वर की मूरत
दानव की सूरत पे
मुखौटे किसने
चढ़ाए रे?

पाप की ज्वाला
धधके क्यूँ है
पुण्य का प्याला
हमेशा क्यूँ
छलकाए रे?

हर चीज़ को बाँटना क्यूँ है
कोई बतलाए रे?

सोच में तेरे
छेद है
इस बात का खुदा को भी खेद है
पर खुदा भी प्यारे
तूने ही बनाए रे.

सिद्धों में
गिद्धों में, अंतर
इच्छा भर का है
फिर सिद्धों को ही क्यूँ
प्रसिद्ध बनाए रे
ताकि हर ओर
लार टपकाते, माँस नोचते
गिद्ध मंडराएँ रे?

बुद्धि और करुणा में
शौर्य और अहिंसा में
किसे चुनें हम?
हरदम चुनाव को चुनौती ही
क्यूँ बनाए रे?

अंतर, भेद, चुनाव
के ही हरदम
क्यूँ भाले चलाए रे
मानव ही जब
सब बनाता
खुदा को ही
ढाल क्यूँ बनाए रे?

सब तो तूने राख किया है
फूँक दे सब जो
सामने तेरे आए रे
जब उत्तर ढूँढना ही नही है
फिर प्रश्न को भी
आग क्यूँ ना लगाए रे
मानव तू बड़ा चतुर है
सब को खेल बनाए रे.




Wednesday, April 13, 2016

युद्ध बुद्ध ( c) Copyright



जब जब युद्ध की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली
चुप्पी चाहिए हो जब सरकार से
तब प्रबुद्ध हो जाती है दिल्ली
जब स्थिरता चाहिए होती है
सुध बुध खो जाती है दिल्ली
जब जब युद्ध की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली

आधों से झुकती, पूरी दिल्ली
प्यादों से फूंकती, पूरी दिल्ली
कभी शौर्य होता था सीने में यहाँ
बिना दिल की, अब अधूरी दिल्ली
शहन्शाहों के तख्त सी
सिंहों सी दहाड़ती दिल्ली
ना जाने दिल इसका कहाँ खो गया
दुबक कर, सहमी, भीगी सी बिल्ली
दिल्ली

इमारतों से क्या होगा
धुएँ से ढ़क़ी हुई है काया
देश भर में भेद जन्मा इसने
खुद गठबंधन ही बस कमाया
सीमाओं पे बहे रक्त से
जेबें भरती है दिल्ली
लहू की गर्मी होती थी कभी इसमे
अब बस बर्फ की सिल्ली है दिल्ली
जब जब युद्द की भाषा बोलनी हो
बुद्ध हो जाती है दिल्ली

~ अनुपम ध्यानी





Thursday, February 4, 2016

मेरी कविता ढोती है ~ © Copyright



जो कहते हैं, मेरी कविता
भारी भरकम शब्दों से लैस होती है
उसमे मिठास कम होती है
उन्हे नहीं पता 
मेरी कविता किस किस का भार ढोती है

जब घर लौटे सैनिक के ताबूत पर
माँ रोती है
उन आँसुओं का भार 
मेरी कविता ढोती है

जब राष्ट्रा निर्माण के लिए
एक सिंग खड़ा अकेला
और बाकी सब की आवाज़
उसके खिलाफ एक हथियार होती है
मेरी कविता उस सिंग
की दहाड़ होती है

जब पिता के कंधे
झुका दें बेटे के कर्म
पाप से रंगे उसके दुष्कर्म
उसे हर बार मुआफ़ करने की
शक्ति नही होती है
उसे क्षमा करने का भार
मेरी कविता ढोती है

जब चट्टानें खड़ी हों
हर मोड़ पर
जब प्रश्न चिन्ह लग जाए
तुम्हारे ज़ोर पर
जब धराशाही हर
उम्मीद होती है
तब कविया मेरी
उन चट्टानो को चीरती
धार होती है

जब प्रशंसा दुर्लभ हो
और निंदा हर बार होती है
श्रम का फल ना मिलने पर भी
कर्मठता तेरी अपार होती है
उस जुझारू तेरी लगन को
मेरी कविता दंडवत हो,
उसे प्रणाम करती 
एक ललकार होती होती है

दयनीय, दंडनीय
घृणित, निंदनीय
जब संसार से ही
मानवता खोती है
उस पतन का भार
मेरी कविता ढोती है
तो भारी हो या भरकम हो
उन मानवता के शवों को
लयबद्ध करने की ज़िम्मेदारी
मेरी कविता की होती है
कड़वाहट से नहा के 
पंक्तियों में मेरी मिठास कम होती है
क्यूँकि मेरे शब्द, पंक्तियाँ, मुक्तक, कविता
कई कई भार ढोती है
कई कई भार ढोती है
~ ©  अनुपम ध्यानी