Dreams

Thursday, September 8, 2011

निर्भीक Copyright ©


बहुत दीनो से मन में ऐसे तूफ़ानों का उबाल था
जैसे पूरा जीवन एक बहुत बड़ा सवाल था
शब्द से नग्न था मन , चित्त भी बेहाल था
पर शून्य से राह ढूँढने का ही तो कमाल था
उठ खड़े हुए रोंगटे, रीड की हड्डी चिलमिला गयी
जब निगाहों के आगे बिखरे रेत के महल देखे
पर यह सपनो के ढाँचे ही तो मेरे हृदय का हाल था


तो उड़ती पतंग के मांजे सा किया मन मजबूत
कमर कस के तीखी निगाहों ने किया इरादे को प्रत्याभूत
मन ही मंदिर मन ही विषम परिस्थितियों से बचाता ढाल था
कुछ तो है इरादों में जो जान फूँक देते है हर गिरते पत्ते पर
कुछ तो है साँसों में जो प्राण फेर देते है सूखी शाखों पर
मेरी टूटी काया को ऐसा अमृत पान कराया इन्होने
कुछ तो है जो हर बार गिरके संभालने का साहस प्रदान करता हर
मुरझाए पत्ते कब हरा कवच फिर से पहें लेते, पता नही
सूखे शब्द भी ना जाने कैसे किसी को जीवन प्रदान कर देते, पता नही
पर जैसे ही यह अभ्युधयान हो जाता, जीवट से भरती गागर
जैसे ज्वार भाटा सा मन हो और हो मन अथाह सागर


तो हे सूखे पत्ते , हे सूखी डाल
इरादों को ना छोड़ कभी, ना कर विश्वास पे सवाल
साँस जो तेरे अंदर है बाकी तो भर ले उसे और बढ़ आगे
परिस्थितियाँ तो बहुत आएँगी , पर तू उभरेगा , हराएगा यह काल
बगुले सा एकाग्र धर और , काक सा हो तेरा प्रयास
मन में कर मंथन और निकाल उस से विश्वास
इरादों को फौलाद कर तू , चट्टान सा उन्हे खड़ा कर
फिर अपने सपनो के महल बना और सज़ा के रख अपने पास


अंधकार तो आने वाले उजाले का प्रतीक है
यदि यह विश्वास है तो तेरा निशाना एकदम सटीक है...
जीवट है तो तू सूखा पत्ता नही.. तू निर्भीक है
इन शब्दों की यह ही बात, यह ही इनकी सीख है!

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